Ramadan - रमजान
रमजान का महिना अल्ला की इबादत!
है। मुहर्रम से शुरूवात होने वाले इस्लामिक कॅलेंडर का नौवा महिना रमजान होता है। माना गया है की इस माह में पवित्र कुराण नाजिल हुई। इस्लाम की बुनियाद पाँच बातोंपर रखी गई है। 1) कलमा 2) नमाज 3) रोजा 4) जकात 5) हज
रमजान को कुराण का महिना भी कहाँ जाता है। रमजान संयम और अनुशासन सिखाता है। रमजान में सब बुरी चिजोंसे, बातोंसे दुर रहते हैं। इस महिने अल्ला अपने बंदो पर रहमत बरसाता है। रमजान में अल्ला के बंदे को 1 के बदले 70 नेकियाँ नसीब होती है। इस साल 2020 में रमजान महिने की शुरूवात 23 एप्रिल से 24 मई है।
1) कलमा:-
" ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह " अर्थात अल्लाह एक है, उसके अलावा कोई दूसरा नहीं और मुहम्मद उसके रसूल या पैगम्बर ऐसा अर्थ है। कोई भी शुभ काम करने से पहले ये कलमा पढ़ा जाता है। छह कलिमे - 1) कलिमा- ए - तय्यब 2) कलिमा -ए - शहादत 3) कलिमा - ए - तमजीद 4) कलिमा - ए - तौहीद 5)कलिमा - ए - इस्तिगफार 6) रद्दे कुफ्र है।
2) नमाज :-
रमजान को कुराण का महिना भी कहाँ जाता है। रमजान संयम और अनुशासन सिखाता है। रमजान में सब बुरी चिजोंसे, बातोंसे दुर रहते हैं। इस महिने अल्ला अपने बंदो पर रहमत बरसाता है। रमजान में अल्ला के बंदे को 1 के बदले 70 नेकियाँ नसीब होती है। इस साल 2020 में रमजान महिने की शुरूवात 23 एप्रिल से 24 मई है।
1) कलमा:-
" ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह " अर्थात अल्लाह एक है, उसके अलावा कोई दूसरा नहीं और मुहम्मद उसके रसूल या पैगम्बर ऐसा अर्थ है। कोई भी शुभ काम करने से पहले ये कलमा पढ़ा जाता है। छह कलिमे - 1) कलिमा- ए - तय्यब 2) कलिमा -ए - शहादत 3) कलिमा - ए - तमजीद 4) कलिमा - ए - तौहीद 5)कलिमा - ए - इस्तिगफार 6) रद्दे कुफ्र है।
2) नमाज :-
इस्लाम में हर आदमी को दिन में पाँच वक्त की नमाज पढ़ना जरूरी है। इसे अल्ला की इबादत भी कहते हैं। नमाज को अरबी में सलात कहते हैं। पाँच नमाजे - 1) नमाज - ए - फज्र 2) नमाज - ए - जुहर 3) नमाज - ए - अस्त्र 4) नमाज - ए - मगरिब 5) नमाज - ए - इशा ये है। सप्ताह में जुम्मे की नमाज की अहमियत होती है। यह नमाज सात मिलकर पढ़ी जाती है। इसके बाद खुदबा भी होता है।
3) रोजा :-
रोजा रखना इस्लाम में एक फर्ज माना गया है।
सन 2 हीजरी में कुराण पाक में रोजे फर्ज किये गये। रोजा रखनेवालों को रोजेदार भी कहते हैं। घर का हर कोई सदस्य रमजान में रोजा रखते हैं। रमजान कुछ वजह ऐसी भी है जहाँ रोजे रखने में छुठ दि गई है। रोजा को अरबी में सोम कहते हैं। जिसका मतलब रूकना है। कुराण के पारा नं 2 के आयत नं. 183 में रोजा रखना जरूरी बताया गया है। रोजेदार को सच्चे दिल से इबादत करनी होती है।
* सेहरी :-
रमजान महिने में सेहरी का मतलब है ; सूरज निकलने के देड़ घंटा पहले सेहरी की जाती है याने कुछ अच्छा खाया जाता है। उसके बाद रोजा शुरू होता है। आगे पुरा दिन कुछ भी खाना या पिना नहीं होता है।
* इफ्तार :- शाम को सूरज ढलने के 3-4 मिनिट के बाद खजूर खाने के साथ उस दिन का रोजा छोडा जाता है। कुछ अच्छा खाया जाता है। रोजे का यह सिलसिला रमजान के पुरे माह तक चलता है। इशा की नमाज के बाद (रात 9 बजे के बाद) तरावी की नमाज होती है। इस दौरान कुराण का पठण किया जाता है।
* रोजे रखने का मकसत - अल्ला के प्रति भरोसा बढ़ाना होता है।
* रमजान माह में तीन दौर माने गये है।
1) रहमतों का दौर - माह के पहले 10 दिन
2) माफी का दौर - माह के बीच के 10 दिन
3) जहान्नुम से बचने के लिए पुकारने का दौर आखरी 10 दिन
* शबे कद्र की रात -
जो आखरी 10 दिन के 21, 23, 25, 27, 29 को मानी जाती है। यह रात 1000 महिनों से बेहतर मानी गयी है। इस दिन अल्ला के फरिश्ते जमिन पर उतरतें है।
मकफिरत की दुवाँ भी की जाती है। पर यह रात कौन सी होगी यह किसीको मालूम नहीं होता।
4) जकात :-
इस्लाम मेें जकात देना फर्ज माना गया है। एक साल में अपनी संपत्ती के 2.5% जकात देना होता है। जकात गरीब, यतीम, रिश्तेदार, दोस्त, फकिर, धार्मिक काम करनेवाले लोग, संस्था इनको जकात दि जाती है। अपने परिवार वालों को जकात नहीं दी जाती। जकात देने का मकसत मदत करना होता है।
5) हज :-
इस्लाम में हज कर्तव्य माना गया है। अपने पुरे जिंदगी में एक बार हज करना होता है। जिन मुसलमानों की आर्थिक परिस्थिती एवंम शारिरीक स्थिती अच्छी होती है; वे हज के लिए पवित्र शहर मक्का जाते हैं। यह शर्त पुरा करने वालों को मुस्ताती कहते हैं। साल के आखरी माह( इस्लामिक कॅलेंडर) में हज की तारीख होती है, पर ये तारीख बदलती रहती है। इस साल हज की यात्रा 28 जुलाई से 2 अगस्त के बीच है।
* ईद - उल - फितर :-
ईद का पर्व हजरत मोहम्मद साहब के बद्र के युद्ध में विजय मिलने के खुशी में मनाया जाता है। 624 इस्वी में पहली बार ईद मनायी गई। रमजान महिने में 29 या 30 रोजे होते है। पवित्र कुराण की तिलावत माह में की जाती है। रमजान में अल्ला के प्रती सच्चे दिल से इबादत करने के बाद ईद मनाई जाती है। अल्ला का शुक्रिया किया जाता है। ईद की नमाज सब लोग इदगाह या मसजीद में एक साथ पढ़ते हैं। मोहब्बत और खुशियाँ बाटणे का ये त्यौहार है। नमाज के बाद सब लोग एक - दुसरे के गले मिलकर ' ईद मुबारक' कहते हैं। ये हर्ष और आनंद का त्यौहार है। घर-घर में शिरकुरमा, स्वादिष्ट पकवान बनाए जाते है। अपने दोस्त, रिश्तेदारों को मिला जाता है। नये कपडे परिधान किऐ जाते हैं। चेहरेपर खुशियाँ दिखती हैं। ईद इस साल 25 मई को मनाई जा रही है। ये सब चाँद दिखने पर निर्धारीत रहता है।














Good job sir
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